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दूसरा पहलू: जब धरती पर राज करते थे खूंखार मगरमच्छ; क्या है मेकोसुचाइन?
जोर्गो रिस्तेव्स्की
Published by: Pavan
Updated Wed, 27 May 2026 08:43 AM IST
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सार
एक समय खूंखार मगरमच्छों का एक अनोखा समूह था, जिसे मेकोसुचाइन कहा जाता है। ये जीव आज के किसी भी मगरमच्छ से बिल्कुल अलग थे। टूटे हुए दांतों और हड्डियों से पता चलता है कि आधुनिक मगरमच्छ हजारों वर्षों तक मनुष्यों के साथ उसी भूभाग में रहते रहे। लोग मगरमच्छों का शिकार करते थे, उनका मांस खाते थे व उनके दांतों से आभूषण बनाते थे। हालांकि ऐसे प्रमाण बहुत कम हैं। संभवतः इसका कारण यह था कि खारे पानी के मगरमच्छ अत्यंत घातक होते हैं, इसलिए लोग उनसे डरते थे।
जब धरती पर राज करते थे खूंखार मगरमच्छ
- फोटो : ANI
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विस्तार
कीचड़ भरे किनारे पर धूप सेंकते हुए खारे पानी के मगरमच्छ को देखना, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सबसे मशहूर और डरावने नजारों में से एक है। एक समय, ऑस्ट्रेलिया और उसके आसपास के क्षेत्रों में मगरमच्छों का एक अनोखा समूह मौजूद था, जिसे मेकोसुचाइन कहा जाता है। ये जीव आज के किसी भी मगरमच्छ से बिल्कुल अलग थे। लगभग पांच करोड़ वर्षों तक मेकोसुचाइन ऑस्ट्रेलिया क्षेत्र के शीर्ष शिकारी बने रहे।
हालिया अध्ययन में पिछले एक लाख उनतीस हजार वर्षों के जीवाश्म व पुरातात्विक प्रमाणों की समीक्षा की गई। ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी के 20 से अधिक स्थलों से मिले टूटे हुए दांतों और हड्डियों से पता चलता है कि आधुनिक मगरमच्छ हजारों वर्षों तक मनुष्यों के साथ उसी भूभाग में रहते रहे। करीब 20 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र भी इस संबंध की पुष्टि करते हैं। आदिवासियों ने मगरमच्छों को अपनी कला में दर्ज किया। कुछ प्रमाण यह भी बताते हैं कि लोग मगरमच्छों का शिकार करते थे, उनका मांस खाते थे व उनके दांतों से आभूषण बनाते थे। हालांकि ऐसे प्रमाण बहुत कम हैं। संभवतः इसका कारण यह था कि खारे पानी के मगरमच्छ अत्यंत घातक होते हैं, इसलिए लोग उनसे डरते थे।
ऑस्ट्रेलिया में मेकोसुचाइन के समाप्त होने का वास्तविक कारण अब भी रहस्य बना हुआ है। हालांकि न्यू कैलेडोनिया, वनुआतु व फिजी के द्वीपों पर छोटे आकार के मेकोसुचाइन मनुष्यों के बसने के बाद भी कुछ समय तक जीवित रहे। आज हम एंथ्रोपोसीन युग में जी रहे हैं, जब मनुष्य पृथ्वी को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं व विलुप्तियां तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका स्पष्ट उदाहरण ऑस्ट्रेलिया है। प्रागैतिहासिक अतीत केवल समाप्त हो चुकी दुनियाओं का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है।
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यह समझना कि मगरमच्छ अतीत में जलवायु परिवर्तन व मानव प्रभावों के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करते थे, भविष्य में उनके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करता है। इन प्रश्नों को पूरी तरह समझने के लिए जीवाश्म वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों व संरक्षण विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही मूल निवासियों के ज्ञान भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन समुदायों ने हजारों वर्षों तक इन जीवों के साथ रहकर उन्हें समझा है। उनका अनुभव दुनिया के बचे हुए मगरमच्छों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। -साथ में जूलियन लुईस व निकोल बोइविन (द कन्वर्सेशन)
हालिया अध्ययन में पिछले एक लाख उनतीस हजार वर्षों के जीवाश्म व पुरातात्विक प्रमाणों की समीक्षा की गई। ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी के 20 से अधिक स्थलों से मिले टूटे हुए दांतों और हड्डियों से पता चलता है कि आधुनिक मगरमच्छ हजारों वर्षों तक मनुष्यों के साथ उसी भूभाग में रहते रहे। करीब 20 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र भी इस संबंध की पुष्टि करते हैं। आदिवासियों ने मगरमच्छों को अपनी कला में दर्ज किया। कुछ प्रमाण यह भी बताते हैं कि लोग मगरमच्छों का शिकार करते थे, उनका मांस खाते थे व उनके दांतों से आभूषण बनाते थे। हालांकि ऐसे प्रमाण बहुत कम हैं। संभवतः इसका कारण यह था कि खारे पानी के मगरमच्छ अत्यंत घातक होते हैं, इसलिए लोग उनसे डरते थे।
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ऑस्ट्रेलिया में मेकोसुचाइन के समाप्त होने का वास्तविक कारण अब भी रहस्य बना हुआ है। हालांकि न्यू कैलेडोनिया, वनुआतु व फिजी के द्वीपों पर छोटे आकार के मेकोसुचाइन मनुष्यों के बसने के बाद भी कुछ समय तक जीवित रहे। आज हम एंथ्रोपोसीन युग में जी रहे हैं, जब मनुष्य पृथ्वी को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं व विलुप्तियां तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका स्पष्ट उदाहरण ऑस्ट्रेलिया है। प्रागैतिहासिक अतीत केवल समाप्त हो चुकी दुनियाओं का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है।
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